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"बुलडोजर नहीं, अधिकार दीजिए" - विधानसभा सत्र के दौरान आदिवासी संगठनों का सशक्त स्वर...

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✍️ संवाददाता: Bhopal  |  🖊️ संपादन: MP जनमत

30 जुलाई 2025

Bhopal

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा का सत्र मंगलवार को उस समय गूंज उठा, जब विधानसभा के बाहर आदिवासी संगठनों ने FRA (वन अधिकार अधिनियम) 2006 के क्रियान्वयन को लेकर ज़बरदस्त विरोध दर्ज कराया। नारों में गूंज थी – "बुलडोजर नहीं, पट्टा दो..." और "जंगल हमारा, हक़ हमारा..."।

          संगठनों ने सवाल उठाया कि सरकार आदिवासी कल्याण के नाम पर बड़े-बड़े मंचों से घोषणाएं तो करती है, लेकिन जब जमीन पर हक़ देने की बात आती है, तो बुलडोजर जवाब होता है। प्रदर्शनकारियों का साफ़ कहना था कि FRA केवल फाइलों और भाषणों में जीवित है, ज़मीनी हकीकत इससे अलग है।

हज़ारों दावे लंबित, सैकड़ों बेघर...

FRA 2006 के तहत आदिवासियों को पुश्तैनी वन भूमि पर अधिकार देने का स्पष्ट प्रावधान है। लेकिन प्रदेश भर में आज भी हजारों दावे या तो लंबित हैं या ख़ारिज कर दिए गए हैं।
कुछ मामलों में, जिनके पूर्वजों ने वन भूमि पर वर्षों से खेती की, उन्हें पट्टा तो दूर, घर से भी बेदखल कर दिया गया। संगठनों ने बताया कि कई जिलों में प्रशासन ने उन परिवारों पर भी बुलडोजर चलवा दिए हैं, जिनके दावे अभी वैधानिक प्रक्रिया में हैं। क्या यह संविधान और कानून का उल्लंघन नहीं है?

विकास का मतलब उजाड़ना नहीं...

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि विकास की परिभाषा में जब तक आदिवासी की भागीदारी और सहमति शामिल नहीं होगी, तब तक वह विकास नहीं, विस्थापन कहलाएगा।

संगठन नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द ही FRA के तहत अधिकारों की गारंटी नहीं दी और बुलडोजर संस्कृति बंद नहीं की, तो राज्यभर में व्यापक जन आंदोलन खड़ा होगा।

माँग-पत्र की मुख्य बातें...

लंबित FRA दावों का त्वरित निपटारा

सभी पात्र आदिवासी परिवारों को स्थायी पट्टा

बेदखली और बुलडोज़र कार्यवाही पर तत्काल रोक

ग्रामसभाओं को अधिक अधिकार और निर्णय की स्वतंत्रता

क्या सरकार आदिवासियों की आवाज सुनेगी, या फिर विकास की अंधी दौड़ में उनकी जमीन और अस्मिता कुचली जाती रहेगी...

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