Breaking News

नर्मदापुरम में गैंगरेप के बाद हत्या… कोर्ट का सख्त फैसला… तीनों दोषियों को अंतिम सांस तक जेल की सजा 🔹 पचमढ़ी से लौटते वक्त दर्दनाक हादसा: IIT छात्रों की कार पलटी, एक की मौत… चार घायल, दो गंभीर 🔹 दो जिलों के बीच अटका इंसाफ...! माही नदी ब्रिज पर शव रखकर परिजनों का हंगामा, घंटों जाम... 🔹 एलिवेटेड रोड या चौराहा सुधार...? इंदौर में ट्रैफिक प्लान पर फिर गरमाई सियासत... 🔹 बीयर जब्ती केस में बड़ा कानूनी मोड़ : पुलिस की सख्ती के बाद कोर्ट से ट्रकों को मिली जमानत, अधिवक्ता योगेश खींची की प्रभावी पैरवी 🔹 दर्दनाक हादसा: ट्रैक्टर पलटने से 13 वर्षीय अर्पित की मौत, दो बच्चे घायल... 🔹 कलेक्टर कार्यालय परिसर में ड्रेस कोड पर सवाल... वर्दी भत्ता मिलने के बावजूद अधिकांश भृत्य सामान्य कपड़ों में नजर आते है... 🔹

यह अस्पताल है या सजा घर..? मेघनगर PHC की बदहाली ने खड़े किए सवाल... इलाज नहीं, बदबू की सज़ा… नवजात-मां से मरीज तक बेहाल, मेघनगर PHC में टूटी व्यवस्था और सिस्टम फेल...

 - News image
✍️ संवाददाता: झाबुआ  |  🖊️ संपादन: MP जनमत

16 जनवरी 2026

झाबुआ

इलाज से पहले बदबू की परीक्षा… मेघनगर PHC में टूटी व्यवस्था, जुगाड़ के सहारे अस्पताल और लाचार मरीज...

 

✍️ ऋतिक विश्वकर्मा (संपादक) - एमपी जनमत


झाबुआ। जिले के मेघनगर का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कागजों में भले ही सरकारी योजनाओं की सफलता की कहानी सुनाता हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत बिल्कुल उलटी है। एमपी जनमत की टीम जब कल इस अस्पताल पहुँची, तो बाहर से ही हालात बता रहे थे कि अंदर कुछ ठीक नहीं है। जगह-जगह गंदगी, टूटी दीवारें और बदरंग माहौल ने पहले ही संकेत दे दिया कि इलाज के नाम पर यहां मरीजों को क्या झेलना पड़ता होगा।


अंदर कदम रखते ही पुरुष वार्ड में दो-तीन मरीज उपचाररत मिले। एक मरीज को बोतल चढ़ रही थी, लेकिन पूरे वार्ड में ऐसी तेज बदबू फैली थी कि कुछ देर खड़ा रहना भी मुश्किल हो रहा था। इलाज चल रहा था, लेकिन माहौल ऐसा था जैसे स्वच्छता नाम की कोई चीज़ यहां कभी आई ही न हो।

मेघनगर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के पुरुष वार्ड में मरीज बोतल चढ़वाते हुए, चारों तरफ गंदगी और तेज बदबू के बीच इलाज को मजबूर


बदबू का कारण तलाशने पर रास्ता सीधे शौचालय की ओर गया। शौचालय के गेट के पास ही ज़मीन मूत्र और गंदगी से सनी पड़ी थी। यही वह रास्ता है, जहां से मरीज, परिजन और स्टाफ रोज़ गुजरते हैं। तेज पेशाब की गंध के बीच जब अंदर प्रवेश किया गया, तो हालात और भी भयावह नजर आए।

वॉश बेसिन लगे हुए थे, नल भी मौजूद थे, लेकिन पानी के निकास की कोई व्यवस्था नहीं थी। न कोई पाइप, न नाली, न कोई वैकल्पिक रास्ता, जिससे पानी बाहर जा सके। पानी नीचे जमा होकर बदबू और फिसलन पैदा कर रहा था। ऐसे में साफ-सफाई की उम्मीद करना बेमानी लगने लगा।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मेघनगर में शौचालय के गेट के पास जमीन पर फैली गंदगी और मूत्र, जिससे पूरे वार्ड में बदबू


थोड़ा और अंदर बढ़े तो फर्श पर जमा गंदा पानी और मूत्र साफ दिख रहा था। बाथरूम के दरवाजों की हालत देख कर हैरानी होती है। कहीं दरवाजे पूरी तरह टूटे हुए थे, कहीं बोतल की नली और पट्टियों से बांधकर जैसे-तैसे टिकाए गए थे। एक शौचालय का दरवाजा पूरी तरह टूटा हुआ था, दूसरा आधा लटका हुआ। हालत ऐसी कि अंदर पैर रखने की भी हिम्मत न हो।

मेघनगर पीएचसी में लगे वॉश बेसिन में नल तो हैं लेकिन पानी की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं, नीचे जमा गंदा पानी


वापस बाहर आकर जब वार्ड की तरफ देखा गया, तो पलंगों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं थी। न चादरें बिछी थीं, न तकिए, न ओढ़ने के लिए कोई चादर। मरीज अस्त-व्यस्त पलंगों पर पड़े थे। ऐसा लग रहा था मानो इलाज सुविधा नहीं, मजबूरी बन चुका हो।

मेघनगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में शौचालय के टूटे दरवाजे बोतल की नली और पट्टियों से बांधे गए, बदहाली की तस्वीर

 

इसके बाद महिला वार्ड में प्रवेश किया गया। यहां दृश्य और भी ज्यादा झकझोर देने वाला था। एक नवजात शिशु और उसकी मां एक ही पलंग पर लेटी हुई थीं। पलंग टूटा हुआ था। चादर इतनी गंदी कि उस पर पड़े धब्बे साफ दिखाई दे रहे थे। न मां के लिए तकिया था, न ओढ़ने के लिए कंबल। पास ही एक और महिला मरीज भी उसी अव्यवस्था के बीच इलाज करवा रही थी।

मेघनगर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के महिला वार्ड में नवजात शिशु और मां टूटे पलंग व गंदी चादर पर इलाज को मजबूर

महिला वार्ड में भी दुर्गंध साफ महसूस हो रही थी। जब उस दिशा में बढ़े, जहां से बदबू आ रही थी, तो सामने एक कमरा दिखाई दिया। उस कमरे का दरवाजा न कुंडी से बंद था, न जंजीर से। उसे भी बोतल की नली से बांधा गया था और वह झूल रहा था। हालत ऐसी थी मानो पूरा सिस्टम अंतिम सांसें ले रहा हो।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मेघनगर के वार्ड के पीछे खुली नाली में जमा गंदा पानी, बदबू और मच्छरों का खतरा

वार्ड के ठीक पीछे खुली नाली दिखाई दी, जिसमें गंदा पानी जमा था। इसी वजह से पूरे वार्ड में बदबू फैल रही थी और मच्छर पनप रहे थे। महिला शौचालयों के लोहे के दरवाजे जंग खाए हुए थे। नीचे से सड़ चुके थे। कहीं कुंडी नहीं, कहीं ताला नहीं। हर दरवाजा जुगाड़ के सहारे टिका हुआ था। ऐसे हालात में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की बात करना सिर्फ दिखावा लगता है।

मेघनगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ड्यूटी चार्ट पर लंबे समय से अपडेट नहीं, अस्पताल व्यवस्था पर सवाल


वॉश बेसिन कई जगह थे ही नहीं। नल जरूर दिखे, लेकिन जंग खाए हुए। न पानी की निकासी, न पानी आने की कोई व्यवस्था। टूटी-फूटी कुर्सियां वार्ड में इधर-उधर पड़ी थीं। फायर सेफ्टी के उपकरण काैने में भंगार की तरह पड़े हुए थे, उन पर धूल की मोटी परत जमी थी। साफ दिख रहा था कि इन्हें सालों से किसी ने छुआ तक नहीं।

मेघनगर पीएचसी में महिला शौचालयों के लोहे के दरवाजे जंग लगे और नीचे से सड़े हुए, न कुंडी न ताला


खिड़कियों में जाले इतने घने थे कि आर-पार देखना मुश्किल हो रहा था। ऐसा लग रहा था मानो मकड़ियों ने यहां स्थायी निवास बना लिया हो। ड्यूटी चार्ट पर नजर डाली तो लगा कि लंबे समय से किसी की ड्यूटी लिखी ही नहीं गई। जिम्मेदारी तय करने का कोई सिस्टम नजर नहीं आया।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मेघनगर में फायर सेफ्टी के उपकरण दीवार पर लगे लेकिन धूल से ढके, लंबे समय से बिना उपयोग और जांच के


अस्पताल के दूसरे भवन में मरीज इलाज के बाद बाहर निकलते दिखे। लगभग हर मरीज के हाथ में बाहर की दवाइयों की पर्ची थी। सरकारी दवाइयों के नाम कहीं-कहीं लिखे थे, लेकिन ज़्यादातर मरीजों को बाहर से दवा खरीदने को कहा गया।

 

मेघनगर के बीएमओ डॉ. विनोद नायक, जिनसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की बदहाली पर संपर्क किया गया, लेकिन स्पष्ट जवाब नहीं मिल पाया
जब इस पूरी अव्यवस्था पर बीएमओ डॉक्टर विनोद नायक से संपर्क किया गया, तो पहले फोन रिसीव नहीं किया गया। बाद में फोन उठाकर “मीटिंग में हूं, बाद में बात करता हूं” कहकर कॉल काट दी गई। इसके बाद कोई जवाब नहीं मिला।

 

झाबुआ के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. बी.एस. बघेल, जिनकी देखरेख में मेघनगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संचालित है, लेकिन ज़मीनी हालात सवाल खड़े कर रहे हैं

प्रभारी सीएमएचओ डॉक्टर बी.एस. बघेल कागज़ों में भले ही सब कुछ सही दिखा रहे हों, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी कह रही है। लाखों रुपये अस्पताल की सुविधाओं, मरम्मत और रखरखाव के लिए आते हैं, लेकिन वह पैसा जाता कहां है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। सफाई एजेंसी कहां है, उसकी जिम्मेदारी कौन तय करेगा, यह भी साफ नहीं है। कायाकल्प योजना के तहत मिले पैसों का हिसाब और काम ज़मीन पर कहीं नजर नहीं आता।

 

झाबुआ जिले की कलेक्टर नेहा मीणा, जिनके संज्ञान में मेघनगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की गंदगी, बदहाली और अव्यवस्थाओं का मामला लाया गया है, अब कार्रवाई की अपेक्षा
कलेक्टर महोदया, यह सिर्फ़ अव्यवस्था की खबर नहीं है, यह चेतावनी है। अगर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह लापरवाही किसी दिन बड़ी घटना में बदल सकती है। ज़िला प्रशासन से उम्मीद है कि वह कागज़ी रिपोर्ट से बाहर निकलकर ज़मीनी हालात देखे और जिम्मेदारों पर ठोस कार्रवाई करे - ताकि अस्पताल इलाज का स्थान बने, बदबू और बेबसी का नहीं।

Comments (0)

अन्य खबरें :-

Advertisement

Advertisement

Advertisement