निगम अधिकारियों को आंखें दिखा रहा मेडिकेयर हॉस्पिटल... कार्रवाई कब...?
05 फरवरी 2026
इंदौर
अवैध तीन फ्लोर, बेसमेंट में ऑफिस और सड़क पर पार्किंग… फिर भी नगर निगम खामोश...
इंदौर (अरविंद आर. तिवारी) । महानगर में अवैध निर्माण पर कार्रवाई के दावों की हकीकत एक बार फिर उजागर हो गई है। नगर निगम के झोन-10 कार्यालय के ठीक सामने स्थित मेडिकेयर हॉस्पिटल अब न सिर्फ नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है, बल्कि खुलेआम निगम अधिकारियों को आंखें दिखाता नजर आ रहा है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि शिकायतें, दस्तावेज और मौके की सच्चाई सब कुछ सामने होने के बावजूद कार्रवाई शून्य बनी हुई है।
यह मामला अब सिर्फ अवैध निर्माण का नहीं रह गया है, बल्कि यह नगर निगम की निष्क्रियता और संदिग्ध चुप्पी का प्रतीक बनता जा रहा है। जिस स्थान पर अधिकारी रोज आते-जाते हैं, जहां से प्रशासन चलता है, वहीं अगर नियमों की ऐसी खुलेआम हत्या हो और कोई हाथ न हिले, तो सवाल उठना लाजिमी है।

जानकारी के अनुसार ओल्ड पलासिया क्षेत्र के रवींद्र नगर में, झोन-10 कार्यालय के सामने स्थित मेडिकेयर हॉस्पिटल का संचालन किया जा रहा है। वर्ष 2009 में नगर निगम द्वारा लाहोटी मेडिकेयर प्राइवेट लिमिटेड की ओर से डॉ. राजेंद्र कुमार के नाम से अस्पताल का नक्शा स्वीकृत किया गया था। यह नक्शा स्पष्ट रूप से जी प्लस 3 यानी तीन मंजिल निर्माण की अनुमति तक सीमित था।

लेकिन जमीनी हकीकत किसी और ही कहानी को बयान कर रही है। अस्पताल परिसर में स्वीकृत नक्शे को ताक पर रखकर छह मंजिल तक निर्माण कर लिया गया है। यानी अनुमति तीन मंजिल की और इमारत दोगुनी ऊंचाई तक खड़ी। यह कोई छुपा हुआ उल्लंघन नहीं है, यह सड़क से साफ दिखाई देता है, फिर भी निगम का बुलडोजर यहां पहुंचने का रास्ता भूल गया है।
नक्शे में जिस बेसमेंट को पार्किंग के लिए स्वीकृत किया गया था, वहां आज पार्किंग का नाम-निशान तक नहीं है। बेसमेंट में ब्लड बैंक, कैंटीन और अन्य कार्यालय संचालित हो रहे हैं। यह सीधे-सीधे भवन अनुमति और सुरक्षा मानकों का उल्लंघन है, लेकिन निगम अधिकारियों के लिए यह सब मानो अदृश्य बना हुआ है।
पार्किंग के अभाव का खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अस्पताल में आने वाले मरीजों, उनके परिजनों और स्टाफ के वाहन सड़क और फुटपाथ पर खड़े किए जा रहे हैं। इससे न केवल यातायात बाधित होता है, बल्कि पैदल चलने वालों की जान भी जोखिम में पड़ती है। कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि एंबुलेंस तक को रास्ता देने में दिक्कत होती है।
स्थिति को संभालने के बजाय अस्पताल प्रबंधन ने पड़ोस की मल्टियों में एक-दो फ्लैट खरीदकर उनकी पार्किंग पर भी कब्जा जमा लिया है। इसके बावजूद जगह नाकाफी साबित हो रही है और सड़क-फुटपाथ पर वाहन खड़े होने का सिलसिला जारी है। इससे आसपास रहने वाले लोग लगातार परेशान हैं और विवाद की नौबत बनी रहती है।
भवन नियमों के तहत अस्पताल परिसर में एमओएस यानी अनिवार्य खुला स्थान छोड़ा जाना जरूरी होता है, ताकि हवा, रोशनी और आपात स्थिति में सुरक्षित निकासी संभव हो सके। लेकिन मेडिकेयर हॉस्पिटल में एमओएस को भी पूरी तरह कवर कर लिया गया है। इसके बावजूद न तो इसे खाली कराने की कार्रवाई हुई और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही तय हुई।
लोगों और अधिकारियों को गुमराह करने के लिए ग्राउंड फ्लोर पर एक बोर्ड जरूर लगाया गया है, जिसमें पार्किंग को बेसमेंट की ओर दर्शाया गया है। मगर हकीकत यह है कि बेसमेंट में जाकर देखने पर एक-दो साइकिल के अलावा कुछ नहीं मिलता। यह दिखावे की वह तस्वीर है, जिसके पीछे सच्चाई छुपाने की कोशिश साफ झलकती है।
सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल यही है कि यह सब नगर निगम झोन-10 कार्यालय के ठीक सामने हो रहा है। यानी यह नहीं कहा जा सकता कि अधिकारियों को जानकारी नहीं है। इसके बावजूद कार्रवाई न होना इस आशंका को और गहरा करता है कि कहीं न कहीं मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि संरक्षण और लीपापोती का भी हो सकता है।
आज स्थिति यह है कि मेडिकेयर हॉस्पिटल का अवैध निर्माण नगर निगम की आंखों में आंखें डालकर खड़ा है। आम नागरिक के घर की एक ईंट नियम से बाहर हो जाए, तो तुरंत नोटिस और कार्रवाई होती है, लेकिन यहां नियमों का पूरा ढांचा ढहा दिया गया और निगम खामोश है।
एमपी जनमत इस मुद्दे को यहीं थमने नहीं देगा। यह सिर्फ एक अस्पताल का मामला नहीं, बल्कि नियम, जवाबदेही और जनहित से जुड़ा सवाल है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं होती, तो यह माना जाएगा कि सिस्टम खुद अवैध निर्माण के आगे नतमस्तक हो चुका है।






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