कलेक्टर कार्यालय परिसर में ड्रेस कोड पर सवाल... वर्दी भत्ता मिलने के बावजूद अधिकांश भृत्य सामान्य कपड़ों में नजर आते है...
23 फरवरी 2026
झाबुआ
✍️ ऋतिक विश्वकर्मा | एमपी जनमत
झाबुआ। जिला कलेक्टर कार्यालय परिसर में संचालित अलग-अलग विभागों के बाहर ली गई तस्वीरों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है। परिसर के गलियारों में बैठे कई चपरासी (भृत्य) सामान्य कपड़ों में दिखाई देते है, जबकि नियमों के अनुसार उन्हें वर्दी पहनना जरूरी होता है और इसके लिए वर्दी के पैसे भी दिए जाते हैं।

कलेक्टर कार्यालय में एडीएम, जिला आबकारी, लोक सेवा प्रबंधन, महिला बाल विकास, काेषालय, सर्व शिक्षा, जनजातीय कार्य विभाग, एसडीएम कार्यालय, जनसंपर्क सहित कई महत्वपूर्ण विभाग चलते हैं। रोज बड़ी संख्या में लोग अपने काम के लिए यहां आते हैं। ऐसे में कार्यालय का अनुशासन और कर्मचारियों की पहचान साफ दिखाई देना जरूरी माना जाता है।

मौके पर ली गई तस्वीरों में देखा गया कि अलग-अलग विभागों के बाहर बैठे अधिकतर चपरासी साधारण शर्ट-पैंट या अन्य सामान्य कपड़ों में नजर आए। यह स्थिति किसी एक कमरे या एक विभाग तक सीमित नहीं दिखी, बल्कि कई जगह लगभग एक जैसी तस्वीर सामने आई।

सरकारी नियमों के मुताबिक चपरासियों को तय वर्दी में ड्यूटी करना होता है। इसके लिए सरकार की ओर से हर साल वर्दी भत्ता दिया जाता है, ताकि कर्मचारी अपनी वर्दी बनवा सकें और दफ्तर में उसी में उपस्थित रहें। वर्दी का मकसद सिर्फ कपड़े बदलना नहीं होता, बल्कि इससे यह साफ रहता है कि कौन कर्मचारी है और कौन आम नागरिक। इससे दफ्तर का अनुशासन भी बना रहता है।

जब सरकार वर्दी के लिए पैसा दे रही है, तो यह उम्मीद भी रहती है कि कर्मचारी तय वर्दी में ही ड्यूटी करें। ऐसे में जब अधिकतर कर्मचारी सामान्य कपड़ों में नजर आते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ड्रेस कोड को लेकर कोई सख्ती है...? क्या इसकी जांच या निगरानी की जाती है...

यह भी जानना जरूरी है कि कहीं वर्दी के पैसे समय पर नहीं मिल रहे हैं या कोई और वजह तो नहीं है। अगर पैसे मिल रहे हैं, तो फिर वर्दी में क्यों नहीं दिख रहे...? और अगर पैसे नहीं मिल रहे, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है...?
कलेक्टर कार्यालय जिले का सबसे बड़ा प्रशासनिक केंद्र होता है। यहां से पूरे जिले की व्यवस्था संचालित होती है। ऐसे में यदि यहीं नियमों के पालन को लेकर ढिलाई दिखे, तो यह व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
संभव है कि किसी दिन कुछ कर्मचारी वर्दी में न रहे हों, लेकिन जब तस्वीरों में अधिकांश कर्मचारी सामान्य कपड़ों में दिखते हैं, तो इसे सामान्य बात मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अब जरूरत है कि जिला प्रशासन इस मामले को गंभीरता से देखे और यदि वर्दी अनिवार्य है तो उसका पालन भी सख्ती से कराया जाए। यह मुद्दा सिर्फ कपड़ों का नहीं है, बल्कि नियमों के पालन और जवाबदेही से जुड़ा है।





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