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जो दिखाओगे… हम देखेंगे : झाबुआ में नए कलेक्टर की एंट्री… उम्मीदों का सवेरा और चुनौतियों की अग्निपरीक्षा…?

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✍️ संवाददाता: झाबुआ  |  🖊️ संपादन: MP जनमत

14 अप्रैल 2026

झाबुआ

✍️ ऋतिक विश्वकर्मा | एमपी जनमत

झाबुआ। सत्ता के गलियारों में एक नई आहट सुनाई दी है… एक नई दस्तक… एक नई उम्मीद… नवागत कलेक्टर ने जैसे ही पदभार संभाला… वैसे ही शब्दों के माध्यम से एक संदेश भी दे दिया… साफ… सीधा… और बिना लाग-लपेट के… “जो दिखाओगे… हम देखेंगे”… यह सिर्फ एक वाक्य नहीं… बल्कि प्रशासनिक मानसिकता का संकेत है…


पत्रकारों के बीच बैठे कलेक्टर ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि खबरों से घबराने का नहीं… उन्हें समझने और सुधार का माध्यम मानने का समय है… सुशासन की बात करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि जब योजनाएं धरातल पर उतरेंगी… तो खबरें भी वैसी ही होंगी… और यदि शासन कहीं ढीला पड़ा… तो स्याही भी वही सच्चाई उकेरेगी… यह स्वीकारोक्ति कम नहीं है… यह संकेत है कि संवाद का दरवाजा खुला रहेगा…


उन्होंने पत्रकारों को छोटे-बड़े के खांचे में बांटने से भी इंकार किया… यह बात साधारण लग सकती है… लेकिन प्रशासनिक व्यवहार में यही सबसे बड़ी असाधारणता होती है… जब कलम और कुर्सी आमने-सामने नहीं… बल्कि साथ-साथ चलते हैं… तब जनता के कष्ट स्वतः हल्के होने लगते हैं…


लेकिन… हर नई शुरुआत अपने साथ कुछ कठिन प्रश्न भी लेकर आती है… और झाबुआ में इस समय सबसे बड़ा प्रश्न है… “जल गंगा संवर्धन अभियान”… कागजों पर बहती गंगा और जमीन पर सूखी धाराओं का अंतर पहले भी चर्चा में रहा है… आंकड़ों की चमक और हकीकत की धूल के बीच जो दूरी बनी… उसने कई सवाल खड़े किए…


अब यह अभियान नवागत कलेक्टर के लिए सिर्फ एक योजना नहीं… बल्कि एक कसौटी बन गया है… यदि इस बार भी वही पुरानी कहानी दोहराई गई… तो तीर सीधा उनके नेतृत्व पर लगेगा… इसलिए हर कदम फूंक-फूंककर रखना होगा… हर आंकड़े को जमीन से जोड़ना होगा…


और केवल यही नहीं… स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे दो स्तंभ भी उनकी प्रतीक्षा में खड़े हैं… जहां लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं… झाबुआ जैसे जिले में प्रशासन चलाना… केवल आदेश देने भर का काम नहीं… यह जमीन की नब्ज पकड़ने का काम है…


अब देखना यह है कि कलेक्टर की यह आत्मविश्वास भरी शुरुआत… क्या वाकई झाबुआ के सिस्टम में नई ऊर्जा भर पाती है… या फिर यह भी समय के साथ एक और औपचारिक बयान बनकर रह जाती है… फिलहाल… उम्मीद की लौ जली है… और झाबुआ की जनता… उसी रोशनी में अपने भविष्य की तस्वीर देखने की कोशिश कर रही है…

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