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RTI का बड़ा खुलासा… जानकारी मांगी तो घिर गया आवेदक… विभाग के पास नहीं थे दस्तावेज… अब उन्हीं लोगों से जुटाई जा रही जानकारी...

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✍️ संवाददाता: झाबुआ  |  🖊️ संपादन: MP जनमत

02 मई 2026

झाबुआ

✍️ ऋतिक विश्वकर्मा | एमपी जनमत

सूचना का अधिकार… लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी… लेकिन जब यही कड़ी कमजोर दिखने लगे… तो सवाल सिर्फ एक मामले का नहीं… पूरी व्यवस्था का हो जाता है…

              मामला जनजातीय कार्य विभाग से शुरू होता है… जहां आवेदक ने कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी मांगी… एक बिंदु उसी विभाग के उपक्रम से जुड़ा था… नियम के तहत आवेदन धारा 6(3) में एकीकृत जनजातीय विकास परियोजना (आईटीडीपी) को भेज दिया गया… यहां तक प्रक्रिया सही नजर आती है…


लेकिन इसके बाद कहानी पलट जाती है… जानकारी नहीं आती… जवाब नहीं आता… और अचानक फोन आने लगते हैं… वो भी उन्हीं लोगों के… जिनकी जानकारी मांगी गई थी…
यहीं से पहला बड़ा सवाल खड़ा होता है… जानकारी मांगी गई थी… या जानकारी बाहर पहुंचा दी गई थी…


आवेदक का आरोप है कि सूची में शामिल लोगों तक सूचना पहुंची… और इसके बाद कॉल्स का दबाव शुरू हो गया… यह स्थिति न केवल RTI की गोपनीयता पर सवाल उठाती है… बल्कि आवेदक की सुरक्षा को लेकर भी चिंता पैदा करती है…
इसी बीच… एक और चौंकाने वाली परत सामने आती है… जिन दस्तावेजों और सूची की जानकारी मांगी गई थी… वह विभाग के पास पहले से उपलब्ध ही नहीं थी…

अब विभाग वही जानकारी… उन्हीं लोगों से जुटा रहा है… जिनकी सूची RTI में मांगी गई थी… यानी पहले जानकारी मांगी गई… फिर उसी जानकारी को बाहर से इकट्ठा करने की प्रक्रिया शुरू हुई…


यहीं सबसे बड़ा और गंभीर प्रश्न खड़ें होते है… क्या विभाग ने बिना दस्तावेजों के ही काम कर दिया था… क्या नियमों को दरकिनार कर प्रक्रियाएं पूरी की गईं… और अगर रिकॉर्ड था… तो पहले उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया…


RTI का स्पष्ट सिद्धांत है… जो रिकॉर्ड में है… वही दिया जाएगा… लेकिन यहां तो रिकॉर्ड ही अधूरा या अनुपस्थित नजर आ रहा है… और अब उसे तैयार कर जवाब देने की स्थिति बन रही है…

 

जब इस पूरे मामले में संबंधित अधिकारी निशा मेहरा से चर्चा की गई… तो उन्होंने कहा… मामला उनके संज्ञान में हाल ही में आया है… संबंधित शाखा प्रभारी से बात कर सत्यता की जांच कराई जाएगी… और जो तथ्य सामने आएंगे… उसके अनुसार उचित कार्रवाई की जाएगी…


लेकिन अब यह मामला केवल जानकारी देने का नहीं रहा… यह मामला बन गया है… पारदर्शिता… जवाबदेही… और प्रक्रिया की सच्चाई का… क्या जांच में जिम्मेदारी तय होगी…
क्या आवेदक को राहत और सुरक्षा मिलेगी… या फिर यह मामला भी फाइलों के बीच कहीं दब जाएगा…

                RTI में जानकारी मांगना जनता का अधिकार है… और अगर उसी अधिकार के रास्ते में प्रश्न खड़े होने लगें… जानकारी बाहर जाने लगे... गाेपनीयता भंग हाेने लगे तो यह सिर्फ एक खबर नहीं… एक चेतावनी है… जानकारी के बदले दबाव बनाने के लिए... और आवेदक काे परेशान करने की भ्रामक रणनीति की.... सूचना का अधिकार… जवाबदेही का आईना… लेकिन इस बार आईने में जो तस्वीर दिख रही है… वह कई सवाल खड़े कर रही है…

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