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बंगाल का जनादेश… आज लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा…

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✍️ संवाददाता: संपादकीय  |  🖊️ संपादन: MP जनमत

04 मई 2026

संपादकीय

✍️ ऋतिक विश्वकर्मा | एमपी जनमत


आज का दिन… पश्चिम बंगाल के लिए साधारण नहीं है… आज 4 मई 2026… मतगणना का दिन है… और इस चुनाव में अभूतपूर्व मतदान हुआ है… जब जनता इतनी बड़ी संख्या में घरों से निकलती है… तो वह सिर्फ मतदान नहीं करती… वह संदेश देती है… प्रश्न यह नहीं कि किसकी सरकार बनेगी… प्रश्न यह है कि जनता क्या कहना चाहती है…

दो ध्रुव सामने हैं… और बीच में खड़ा है एक बड़ा सवाल… एक ओर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस… जिसका आधार है कल्याणकारी योजनाएं… ममता की व्यक्तिगत छवि… मजबूत स्थानीय संगठन… और “बंगाली अस्मिता” का भावनात्मक आह्वान… ममता बनर्जी ने इस चुनाव को प्रशासनिक नहीं… बल्कि भावनात्मक बना दिया…


दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी… जो परिवर्तन की भाषा बोल रही है… भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष… और महिलाओं की सुरक्षा का वादा… वह कहती है — अब बहुत हुआ… अब बदलाव जरूरी है… यह संघर्ष सीटों का नहीं है… यह संघर्ष विचारों का है… एक पक्ष कहता है — हमने दिया है… आगे भी देंगे… दूसरा कहता है — जो दिया गया… वह पर्याप्त नहीं… और कई बार संदिग्ध भी…


एग्जिट पोल अपनी जगह हैं… अनुमान अपनी जगह… लेकिन भारत का मतदाता… अनुमान से नहीं चलता… वह चुप रहता है… और अंत में चौंकाता है… चुनाव के बीच जो सबसे गंभीर बात उभरी… वह है भरोसे का संकट… मतगणना से पहले ही मशीनों पर सवाल उठना… प्रशासन की निष्पक्षता पर आरोप लगना… ये संकेत अच्छे नहीं हैं… लोकतंत्र की असली ताकत सिर्फ मतदान नहीं… बल्कि विश्वास है…


ममता बनर्जी की सबसे बड़ी चुनौती सत्ता की लंबी उम्र है… पंद्रह वर्षों का शासन… अपने साथ थकान भी लाता है… सरकारी तंत्र… धीरे-धीरे जनता से दूर हो जाता है… भ्रष्टाचार के आरोप… स्थानीय असंतोष… ये वे दरारें हैं… जो ऊपर से नहीं दिखतीं… लेकिन मतदान में साफ दिखाई देती हैं…


वहीं भारतीय जनता पार्टी की सीमा भी स्पष्ट है… राष्ट्रीय स्तर का नेतृत्व… विस्तृत संसाधन… लेकिन स्थानीय चेहरा नहीं… बंगाल में “बाहरी” होने का आरोप… सिर्फ राजनीतिक हमला नहीं… यह एक मनोवैज्ञानिक बाधा है…


बीच में… कभी बंगाल की राजनीति के स्तंभ रहे… भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस… आज सीमित प्रभाव में हैं… लेकिन कुछ क्षेत्रों में वे परिणामों की दिशा बदलने की क्षमता रखते हैं…


अंततः… निर्णय जनता के हाथ में है… जनता न थकती है… न डरती है… न शोर करती है… वह चुपचाप मतदान करती है… और उसी चुप्पी में इतिहास लिख देती है… आज वही इतिहास सामने आएगा…

               जो जीते… उसे यह याद रखना होगा… कि सत्ता अधिकार नहीं है… सत्ता दायित्व है… और शासन… सेवा का माध्यम होना चाहिए… …

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